Jammu Kashmir Election News: कार में गैंगरेप और आरा मशीन से हत्या: कश्मीर में आतंकवाद का फैलाव

Jammu Kashmir Election News | 8 वर्षीय शादीशुदा महिला, गिरिजा टिक्कू, जो एक Government स्कूल में Lab Assistant थीं, ने घाटी में बिगड़ते हालात के कारण अपने परिवार के साथ जम्मू पलायन किया था। पैसों की कमी के कारण, वह अपनी Salary लेने के लिए घर लौटी।

गिरिजा Bandipora में एक मुस्लिम परिवार के घर में ठहरी हुई थीं। अचानक, कुछ Armed लोग घर में घुस आए। गिरिजा की आंखों पर पट्टी बांधकर उसे Car में बिठा लिया गया। सभी ने उसका सामूहिक बलात्कार किया। गिरिजा ने बदहवासी की हालत में उनमें से एक की आवाज पहचान ली और उसे नाम से पुकारा।

पहचान उजागर होने के डर से बलात्कारियों ने गिरिजा को Car से बाहर निकाला और पास की Sawmill में ले गए। आरी से गिरिजा के दो टुकड़े कर दिए और शव वहीं फेंक दिया। Postmortem में पता चला कि काटे जाते वक्त गिरिजा की सांसें चल रही थीं। 1990 के दशक का कश्मीर ऐसे ही खूनी किस्सों से भरा हुआ था।

‘Kashmir Ki Kahani’ सीरीज के चौथे एपिसोड में आज घाटी में आतंकवाद बढ़ने और उसके सबसे बड़े शिकार कश्मीरी पंडितों की कहानी…

सितंबर 1982 में कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला का निधन हो गया। उसके बाद हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव में National Conference ने बहुमत हासिल किया और शेख के बेटे फारूक अब्दुल्ला Chief Minister बने, लेकिन 1984 में एक बड़ा खेल हुआ।

उस वक्त के Governor जगमोहन मल्होत्रा ने अपनी किताब ‘My Frozen Turbulence in Kashmir’ में लिखा है, ‘1 जुलाई 1984 की देर शाम फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह ने 12 विधायकों के साथ फारूक की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वे Congress (I) के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते थे।’

अगली सुबह Governor ने फारूक की सरकार को बर्खास्त कर दिया। 2 जुलाई की शाम ही Congress और अन्य के समर्थन से गुलाम मोहम्मद शाह ने जम्मू-कश्मीर के Chief Minister पद की शपथ ली। अगले ढाई साल जम्मू-कश्मीर में सबसे भ्रष्ट सरकार का दौर रहा। शाह को कश्मीरी जनता का तीखा विरोध झेलना पड़ा। 7 मार्च 1986 को जीएम शाह की सरकार बर्खास्त कर दी गई।

मार्च 1987 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव हुए। इसमें Rajiv Gandhi की Congress और फारूक अब्दुल्ला की National Conference ने गठबंधन किया। दूसरी तरफ, Gilani की Jamaat-e-Islami जैसी एक दर्जन कट्टरपंथी पार्टियों ने मिलकर United Muslim Front यानी MUF बनाया।

एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए यूसुफ शाह। बाद में इसी ने Hizbul Mujahideen नाम का आतंकी संगठन बनाया। इस चुनाव में धांधली की हर सीमा पार हो गई। लेखक और Political Analyst सुमंत्र बोस अपनी किताब ‘Kashmir: Roots of Conflict, Path to Peace’ में लिखते हैं कि वोटरों को उनके घर भेज दिया गया था। Booth Capturing की गई। सारे मतपत्रों पर National Conference और Congress की मुहर लगा दी गई। इसमें सरकार और उनकी पूरी Machinery काम कर रही थी।

नतीजों में भी हेरा-फेरी हुई। लेखक Ashok Kumar Pandey अपनी किताब ‘Kashmirnama’ में इसकी एक बानगी देते हैं। श्रीनगर की आमिर कदल सीट से Muslim United Front के यूसुफ शाह उम्मीदवार थे। उनके Polling Agent का नाम यासीन मलिक था। Beminia Degree College में मतगणना शुरू हुई। रुझानों में यूसुफ बड़े अंतर से जीत रहे थे। उनके प्रतिद्वंदी National Conference के मोइउद्दीन शाह निराश होकर घर चले गए।

थोड़ी देर बाद शाह को मतगणना अधिकारी ने घर से बुलाया और विजयी घोषित कर दिया। ऐसा कई जगह हुआ। लोग सड़क पर उतर आए। इसके बाद सरकार ने मोहम्मद यूसुफ शाह और उसके चुनाव प्रबंधक यासीन मलिक को गिरफ्तार कर लिया। इन चुनाव में National Conference और Congress गठबंधन को जीत हासिल हुई।

मोहम्मद यूसुफ शाह दो चुनाव हार चुका था। तीसरी बार धांधली करके जीता चुनाव हरवा दिया गया। 20 महीने बाद जेल से छूटने के बाद यूसुफ शाह ने Politics छोड़ दी और सीमा पार Pakistan चला गया। यही यूसुफ शाह आतंकी संगठन Hizbul Mujahideen का Commander बना। उसके Polling Agent रहे यासीन मलिक ने Jammu-Kashmir Liberation Front नाम का आतंकी संगठन बनाया।

Kashmir Expert Christopher Snedden अपनी किताब ‘Understand Kashmir and Kashmiris’ में लिखते हैं कि इस चुनाव के बाद सिर्फ यूसुफ शाह ही नहीं, तमाम निराश युवा कश्मीरी Muslims बॉर्डर पार करके PoK चले गए। वहां Pakistani Army और ISI ने उन्हें हथियार चलाने की Training दी। जब वे लौटे तो उनके हाथ में Modern Weapons थे। सपोर्ट करने के लिए पैसा था। Pakistan ने ये सब इसलिए किया था कि वो इन आतंकियों के भरोसे भारत के खिलाफ लड़ सके।

इन चुनावों में Observer रहे जी.एन. गौहर के मुताबिक-

अगर आमिर कदल और हब्बा कदल सीटों पर चुनाव में धांधली नहीं होती, तो शायद कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष को कुछ सालों तक टाला जा सकता था।

लेखक Ashok Kumar Pandey अपनी किताब ‘Kashmir Aur Kashmiri Pandit’ में लिखते हैं कि ‘हत्याओं का जो सिलसिला उस दौर में शुरू हुआ, भारत और कश्मीर के अपरिपक्व राजनीतिक नेतृत्व के चलते वो एक ऐसे हिंसक चक्रव्यूह में फंसता चला गया, जिसे बाहर निकलना आज तक मुमकिन नहीं हुआ, और इसकी कीमत सबको चुकानी पड़ी- बंदूक उठाए लोगों को, बेगुनाह पंडितों और बेगुनाह मुसलमानों को भी।’

1989 वह साल था जिसमें कश्मीर में आतंकवाद हिंसक होना शुरू हुआ। पाकिस्तान से आतंकी Training लेकर आने वाले युवा कश्मीरी किसी भी कीमत पर पंडितों को घाटी से निकालना चाहते थे। 23 जून 1989 को श्रीनगर में Pamphlets बांटे गए। ये Pamphlets ‘Hizb-e-Islami’ नाम के संगठन ने बांटे थे।

Pamphlets में मुस्लिम महिलाओं के लिए लिखा था कि इस्लामिक नियमों को मानना शुरू कर दो, Burqa पहनो। कश्मीरी पंडित महिलाओं से कहा गया कि वो माथे पर तिलक जरूर लगाएं, ताकि उन्हें आसानी से पहचाना जा सके। जो ये बात नहीं मानेगा उसे खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस दौरान हुई एक घटना ने आतंकियों के हौसले और बुलंद कर दिए।

वीपी सिंह को Prime Minister बने अभी 6 दिन हुए थे। उन्होंने अपनी सरकार में पहली बार एक मुस्लिम नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद को Home Minister बनाया था। 8 दिसंबर को दोपहर 3:45 बजे राजधानी दिल्ली के North Block में मुफ्ती अपने कार्यकाल की पहली बैठक कर रहे थे।

ठीक इसी वक्त दिल्ली से करीब 800 किलोमीटर दूर श्रीनगर में उनकी बेटी रूबैया सईद अपनी Duty के बाद Hospital से घर जाने के लिए निकलीं। रूबैया MBBS करने के बाद इस Hospital में Internship कर रही थीं।

Hospital से निकलकर रूबैया JFK 677 नंबर वाली एक Transit Van में सवार हुईं। ये Van लाल चौक से श्रीनगर के बाहरी इलाके नौगाम की तरफ जा रही थी। रूबैया जैसे ही चानपूरा चौक के पास पहुंचीं, Van में सवार तीन अन्य लोगों ने Gunpoint पर Van को रोक लिया। उन लोगों ने रूबैया सईद को Van से नीचे उतारकर सड़क के दूसरी तरफ खड़ी नीले रंग की Maruti Car में बैठा लिया। उसके बाद वह Maruti Car कहां गई, किसी को नहीं पता।

2 घंटे बाद यानी शाम करीब 6 बजे JKLF के जावेद मीर ने एक Local Newspaper को फोन करके जानकारी दी कि हमने भारत के Home Minister मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबैया सईद का अपहरण कर लिया है। JKLF की तरफ से रूबैया को छोड़ने के बदले 20 आतंकियों को छोड़ने की मांग की गई।

13 दिसंबर की दोपहर, यानी 5 दिन, तक सरकार और अपहरणकर्ताओं के बीच बातचीत चलती रही। आखिरकार सरकार ने 5 आतंकियों को रिहा कर दिया। बदले में कुछ ही घंटे बाद लगभग 7.30 बजे रूबैया को सोनवर में मध्यस्थ Justice मोतीलाल भट्ट के घर सुरक्षित पहुंचा दिया गया।

कश्मीरी पंडितों के खिलाफ नफरत 1989 के अंत में और भी जहरीली हो गई थी। उन्हें Loudspeakers पर चेतावनी देकर कश्मीर छोड़ने के लिए कहा जाता था। Ashok Kumar Pandey अपनी किताब ‘Kashmir Aur Kashmiri Pandit’

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